मेरे सनकी अरबपति बनने से पहले

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अध्याय 155

समर की नज़र से

मिया सही थी, बिल्कुल। सुबह कब निकल गई—क्लासों की धुंध में—मुझे ठीक से याद भी नहीं। लंच बस एक बहाना था, स्वाद तक नहीं लगा। आख़िरी घंटी बजते-बजते मेरी घबराहट इतनी तनी हुई थी कि लगा अभी टूट जाऊँगी।

“तू मेरे साथ चल रही है न?” मैंने मिया से पूछा।

“भला ढेर सारे फिज़िक्स के नर्ड्स के ...

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